Satendra Nath Bose :सत्येन्द्र नाथ बोस: जीवन परिचय- सम्पूर्ण जानकारी

Lalit Sharma
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Satendra Nath Bose: सत्येन्द्र नाथ बोस: जीवन परिचय-सम्पूर्ण जानकारी

Satendra Nath Bose [सत्येन्द्र नाथ बोस]: जीवन परिचय-सम्पूर्ण जानकारी - सत्येन्द्र नाथ बोस, भारत के एक ऐसे महान वैज्ञानिक थे, जिनके बिना हमारे देश के वैज्ञानिकों की सूची पूरी नहीं होती। सत्येन्द्र नाथ बोस ने अपने जीवन में ऐसी अनेक खोज की है, जिनसे वैज्ञानिक जगत में आज पूरी दुनिया में उनका प्रख्यात है। सत्येन्द्र नाथ बोस भारत के महान वैज्ञानिक जो की गणितज्ञ और भौतिक शास्त्री थे।

Satendra Nath Bose :सत्येन्द्र नाथ बोस: जीवन परिचय- सम्पूर्ण जानकारी

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बचपन और शिक्षा

Satendra Nath Bose[सत्येन्द्र नाथ बोस] का जन्म 1 जनवरी 1894 को कलकत्ता में हुआ। सत्येन्द्र नाथ बोस के पिता सुरेन्द्र नाथ बोस रेलवे में इंजीनियरिंग विभाग मे काम करते थे। सत्येन्द्र नाथ बोस अपने 7 भाई बहनों में से सबसे बड़े थे।
सत्येन्द्र नाथ बोस की प्रारंभिक शिक्षा उनके घर के पास की सामान्य स्कूल ही हुई थी। इसके बाद उन्होंने न्यू इंडियन स्कूल में शिक्षा प्रारंभ की और इसके बाद हिन्दू स्कूल, कोलकाता से अपनी आगे की स्कूली शिक्षा पूरी की।
सत्येन्द्र नाथ बोस ने अपनी आगे की पढ़ाई प्रेसीडेंसी कॉलेज से पूरा करने का निर्णय लिया। वहा पर उस समय जगदीश चन्द्र बोस और आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय जैसे महान व्यक्तित्व शिक्षक थे। बोस ने सन् 1915 मे M.SC. उत्तीर्ण किया। उन्होंने सन 1916 से लेकर 1921 तक सत्येन्द्र नाथ बोस ने फिजिक्स के प्राध्यापक के पद कार्य किया। वो 1921 में नए स्थापित हुए ढाका विश्वविद्यालय में भौतिकी विभाग में रीडर के तौर पर शामिल हुए।

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उपलब्धियाँ और खोज

सत्येंद्रनाथ बोस कार्य क्षेत्र विज्ञान था। जब बोस और साहा कोलकाता विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे, उस समय बोस ने सोचा कि विज्ञान में कुछ नया करना चाहिए। बोस और साहा ने निश्चय किया कि पढ़ाने के साथ-साथ कुछ समय शोध का भी कार्य करेंगे। शोध में नए-नए विचारों के लिए बोस ने गिब्बस और प्लांक की किताबो को पढ़ना शुरू किया।

1924 में बोस ने एक शोध पत्र लिखा, जिसका नाम उन्होने ‘Planck’s Law and the Hypothesis of Light Quanta’ रखा। इसके अंतर्गत उन्होंने प्लांक के नियम के अगले चरण की खोज की थी। बोस ने क्वान्टम फ़िज़िक्स स्टडि ने एक नई नीव रख थी, आज तक सभी कणों के खोजों का आधार हैं और अभी कुछ समय पहले ही इसी के आधार पर हिंग्स बोसॉन कण की खोज की गयी है। 1924 में जब बोस ने ‘Planck’s Law and the Hypothesis of Light Quanta’ को लिख कर तैयार कर लिया, तो उन्होने जानी मानी विज्ञान शोध पत्रिका ‘फिलासॉफिकल मैगजीन’ में अपना शोधपत्र प्रकाशित होने के लिए भेजा। लेकिन उनका शोधपत्र प्रकाशित नहीं किया गया। ऐसे में उन्होंने हार नहीं मानी और अपने इस शोध पत्र को आइंस्टीन को भेजने का निर्णय लिया और बर्लिन में सीधे अपने शोधपत्र को भेज दिया और आइंस्टीन को इस शोध पत्र पर अपनी राय बताने और इसे जर्मन में अनुवाद करके ‘Zeitschrift fur Physik’ पत्रिका में प्रकाशित करवाने का निवेदन किया।
आइंस्टीन ने बोस के इस शोध पत्र को पढ़ा और इसके महत्त्व को समझा। इसके बाद इस शोधपत्र को आइंस्टीन ने स्वयं जर्मन भाषा में अनुवाद किया और अपने विचार के साथ ‘Zeitschrift fur Physik’ में अगस्त 1924 में प्रकाशित करवाया।

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1924 के बाद बोस और आइंस्टीन से परिचित हुए और आइंस्टीन ने भी बोस के साथ कार्य करने की इक्छा इच्छा जताई। 1924 के बाद बोस भारत के बाहर जाकर शोध कार्य करना चाहते थे और बोस यूरोप के लिए रवाना हुये। 
बोस ने पहले एक वर्ष पेरिस रहकर अपना काम किया। फ्रांस में रहते हुए बोस की 'रेडियोधर्मिता' के बारे में 'मैडम क्यूरी' और 'मॉरिस डी ब्रोग्ली' (लुई डी ब्रोग्ली के भाई) से 'एक्स-रे' के बारे में सिखने की इच्छा जाग्रत हुई। मैडम क्यूरी की प्रयोगशाला में बोस ने बहुत सी गणनाएं और कार्य किया लेकिन रेडियोधर्मिता के विषय में अध्ययन का सपना अधूरा रह गया। लेकिन बोस ने मॉरिस डी ब्रोग्ली के साथ एक्स-रे की नई तकनीकों के बारे में सीखा। 
अक्टूबर, 1925 में बोस ने आइंस्टाइन से मिलने का प्लान बनाया। बोस शुरू से आइंस्टाइन के साथ काम करना चाहते थे। जब बोस बर्लिन पहुँचे तो उन्हें कुछ दिन बाद आइंस्टाइन से मुलाकात का अवसर मिला क्योंकि आइंस्टाइन शहर से बाहर गए हुए थे। बोस को आइंस्टाइन ने कई तरह के प्रश्न पूछे जैसे आपको एक नई सांख्यिकी का विचार कैसे आया और इसका क्या महत्त्व है आदि।


बोस-आइंसटाइन साँख्यिकी सिद्धांत

गुरुत्वाकर्षण नियम ग्रहो और ब्रमांड की अन्य वस्तुओ पर तो लागु होता है। जिसमे दुनिया की हर वस्तु अपने पास की दूसरी वस्तुओ को आकर्षित करती है। लेकिन बहुत सी जगह जैसे गैसों के अणुओ की गति में यह सिद्धांत कार्य नहीं करता है। गैसों में अनगिनत परमाणु होते है, जो हमेशा गतिमान रहते है। यहां पर यह नियम काम नहीं करता, इसलिए मैक्सवेल और बोल्ट्जमैन ने इसे समझने के लिए जिस गणितीय सिद्धांत का प्रतिपादन किया, उसे साँख्यिकी के नाम से जाना जाता है। मैक्सवेल तथा वोल्ट्जमैन द्वारा बनाये गए ये नियम तब तक सही से काम करते रहे, जब तक वैज्ञानिकों को सिर्फ परमाणुओं के बारे में पता था। लेकिन जैसे ही वैज्ञानिकों को यह पता चला कि परमाणु के भीतर भी अनेक प्रकार के कण पाए जाते हैं और उनकी गतियाँ भी बहुत अजीब होती हैं, उनका यह नियम फेल हो गया। तब डॉ. सत्येंद्रनाथ बोस ने नये नियमों की खोज की, जिसे ‘बोस-आइंसटाइन साँख्यिकी’ का नाम दिया गया। परमाणु कण मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं। इनमें से एक का नाम डॉ. बोस के नाम पर ‘बोसॉन’ रखा गया और दूसरे का नाम प्रसिद्ध वैज्ञानिक एनरिको फर्मी के नाम पर ‘फर्मिऑन’ रखा गया।

इसी समय बोस – आइंस्टीन स्टेटिक्स और बोस – आइंस्टीन कनडेनसेट ( पदार्थ की चौथी अवस्था ) संकल्पना हुयी। बोस – आइंस्टीन स्टेटिक्स अध्यन्न के दौरान पॉल दीयरिक, आइंस्टीन और सत्येंद्र नाथ बोस ने साथ में कार्य किया। इसी समय एक विशेष तरह की कणों की खोज हुयी। इस कण का नाम सत्येंद्र नाथ बोस के नाम पर रखने का फैसला लिया और कण का नाम बोसॉन रखा गया।

निधन

सन 1974 में बोस के सम्मान में कलकत्ता विश्वविद्यालय ने एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन के कुछ ही दिनों बाद 4 फ़रवरी, 1974 को सत्येन्द्र नाथ बोस का देहांत हो गया और हमने एक महान भारतीय वैज्ञानिक को खो दिया।

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